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सम्राट विक्रमादित्य

जिनसे न्याय कराने लक्ष्मी-शनि भी आए

रामायण, महाभारत पुराण आदि में वर्णित राजा तथा इतिहास प्रसिद्ध प्रद्योत, नंद, चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त आदि अनेक राजा हैं, परंतु जो दिगन्तव्यापिनी कीर्ति और यश विक्रमादित्य को प्राप्त हुआ, वह यश अन्य किसी राजा को प्राप्त नहीं हुआ। प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार विक्रमादित्य ऐतिहासिक व्यक्ति हैं, परंतु अनेक पाश्चात्य और भारतीय विद्वान भारतीय परंपरा को विश्वासयोग्य नहीं मानकर विक्रमादित्य का ऐतिहासिक अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। उनके मतानुसार विक्रमादित्य किसी विशेष व्यक्ति का नाम न होकर विरूद मात्र था, जो चन्द्रगुप्त, शिलादित्य आदि ने धारण किया।

विक्रमादित्य नगर के बड़े यस्शवी शासक हुए हैं। इनके शासन काल में इस नगर का बहुमुखी विकास हुआ और यहां की कीर्ति सम्पूर्ण भारत में फैली। ईस्वी पूर्व 57 में शकों के विरूद्ध अपनी विजय के उपलक्ष्य में इनके द्वारा विक्रम संवत चलाया गया जो आज भी सर्वमान्य है और भारतीय संस्कृति को गौरव प्रदान कर रहा था। इनमें महाकवि कालिदास तथा ज्योतिष के प्रकांड पंडित वराहमिहिर का नाम प्रसिद्ध है। कुछ पुराणों में विक्रमादित्य की हिन्दू धर्म का संरक्षक तथा शिव भक्त बताया गया है। इनकी न्यायप्रियता और साहस को लेकर सिंहासन बत्तीसी और बैताल पचीसी नामक कस्से बहुत प्रसिद्ध है। किदवंती है कि विक्रमादित्य का सिंहासन रूद्रसागर के दक्षिण में स्थित टीले के नीचे गढ़ा हुआ है। कुछ दशक पूर्व निर्मित सिंहासन बत्तीसी (बत्तीस पुतलियों वाले सिंहासन पर बैठे हुए विक्रमादित्य) की प्रतिमा हरसिद्धि मंदिर की उत्तरी दिशा में कुछ दूरी पर स्थित है।

विक्रमादित्य का सिंहासन और उनकी 32 पुतलिया

साहित्य ग्रंथों में विक्रमादित्य का सिंहासन अत्यधिक प्रसिद्ध है।
किंवदंती है कि विक्रमादित्य के पराक्रम, शौर्य, कलामर्माता तथा दानशीलता से प्रसन्न होकर इंद्र ने यह रत्नजडित स्वर्णिम दिव्य सिंहासन विक्रमादित्य को उपहार में दिया। इसमें 32 पुत्तलिकाएं यानी पुतलियां लगी थीं। यह सिंहासन 32 हाथ लंबा तथा 8 हाथ ऊंचा था। यह भी कहा जाता है कि यह सिंहासन राजा भोज को उज्जयिनी में एक टीले के उत्खनन में प्राप्त हुआ था।

सिंहासन द्वात्रिंशिका के अनुसार सिंहासन में जडित 32 पुत्तलिकाओं के नाम इस प्रकार हैं -
(1) जया
(2) विजया
(3) जयंती
(4) अपराजिता
(5) जयघोषा
(6) मंजूघोषा
(7) लीलावती
(8) जयावती
(9) जयसेना
(10) मदनसेना
(11) मदनमंजरी
(12) श्रृंगारमंजरी
(13) रतिप्रिया
(14) नरमोहिनी
(15) भोगनिधि
(16) प्रभावती
(17) सुप्रभा
(18) चन्द्रमुखी
(19) अन्नगध्वजा
(20) कुरंगनयना
(21) लावण्यवती
(22) सौभाग्यमंजरी
(23) चन्द्रिका
(24) हंसगमना
(25) विद्युतप्रभा
(26) चन्द्रकांता
(27) रूपकांता
(28) सुरप्रिया
(29) अन्नदाप्रभा
(30) देवनंदा
(31) पद्मवती
(32) पद्मिनी

विक्रम संवत् पहले मालव संवत था भारतवर्ष का सबसे अधिक प्रचलित संवत् ’विक्रम संवत्’ है। साहित्यिक कृतियों में उल्लिखित राजा विक्रमादित्य इस संवत् के प्रवर्तक माने जाते हैं। विक्रमादित्य ने शकों का उन्मूलन कर शकों पर विजय के उपलक्ष्य में इस संवत् का प्रवर्तन किया। विक्रम संवत् का शिलालेखों में उल्लेख -

पहले यह संवत् मालव संवत् कहलाता था। अनेक शिलालेखों में इस मालव संवत् कहा गया है। सबसे पहले धोलपुर से प्राप्त चण्ड महासेन के वि.स. 808 (ई.सं. 841) के निम्न लेख में विक्रम के नाम का प्रयोग मिलता है -

’वसु नव अष्टौ वर्षागतस्य कालस्य विक्रमाख्यस्य।’


इसके पूर्व के लेखों और ताम्रपत्रों में विक्रम के स्थान पर कृत और मालव के नाम का उल्लेख है-

01. श्रीर्मालवगणाम्नाते प्रशस्ते कृत संज्ञिते।

02. कृतेषु चतुर्षु वर्ष शतेष्वे काशीत्युत्तरेष्वस्थां मालवपूर्वायां (मालव संवत् 481)

शकों ने मालवगणों पर आधिपत्य कर लिया था। विक्रमादित्य नामक उनके नेता ने मालवगणों की सहायता से शकों का उन्मूलन कर दिया। इस राष्ट्रीय विजय की स्मृति में नया संवत् चलाया तथा ’मालवानां जयः’ से अंकित सिक्के भी चलवाए।